आस्था और अन्धविश्वाश
दोस्तों आज में पहली बार इस माद्यम का इस्तमाल प्रयोग के तौर पर कर रहा हूँ , मुझे नहीं पता कि इसमें मुझे कितनी सफलता मीलेगी लेकिन फिर भी मुझे लगता है कि यह अपने विचारो को व्यक्त करने का ससक्स्त माध्यम हो सकता है । मुझे उम्मीद है कि आप मुझे मेरी टाइपिंग कि गलतियों के लिए क्षमा करेंगे ।आस्था और अन्धविश्वाश
मित्रो पिछेले दिनों मीडिया में कुछ बाबाओं के द्वारा सेक्स का धंधा धर्म के आड़ में चलाये जाने की खबर छाई रही
। लोगो का आकरोश भी साथ ही मीडिया में आता रहा । आम जनता और मीडिया ने सिरे से इन थाकथित धर्म गुरुओ को इस कुकर्म के लिए जिमेवार करार दिया । इसमें कोई दो राय नहीं की इस तरह की घटनाये न सिर्फ समाज की आस्था पर चोट है बल्कि समज की आंख खोलने वाली घटना भी है। निश्चित रूप से इस तरह की हरकतों को रोकना चाहिए । परन्तु मेरा सवाल मुझे और इस समाज के साथ- साथ मीडिया से भी है कि इन बाबाओं के फलने फूलने में जनता के अंधविश्वाश के साथ-साथ हमारी प्रबुद्ध मीडिया का भी योगदान है। जो मीडिया इस बात को ले एक्सक्लुसिव खबरे दिखा रही है और बढ़ चढ़ कर इन लोगो को बेनाक्ब करने का दावा कर रहे है जो करना उनका फ़र्ज़ भी बनता है । लेकिन मेरा सवाल इस मीडिया के आचरण पर भी है जो इन पाखंडी बाबों को प्रश्रय देने का काम अनजाने में ही सही लेकिन कर रही है। इनको ख्यति दिलाने में मीडिया कि मुख्य भूमिका रही है। हर चानेल पर तमाम तरह के चन्दन टिकाधारी लोग तमाम तरह कि भविष्य वाणी और दुखों का निवारण करते मिले जायेंगे। कोई पत्थर बेच रहा होता है तो कोई शनि से छुटकारा दिला रहा होता है। भगवन न करे अगर इनमे कोई कल मीडिया कि खबर बन जाये।
भारतीय समाज में कोई भी संत महात्माओं कि भूमिका को कोई भी नकार नहीं सकता। इनका योगदान भारतीय समाज के नवनिर्माण हमेशा स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जायेगा .भारतीय इतिहस संतो का इतिहस है। स्वामी विवेकानंद ,रामतीर्थ ,मदरटेरेसा ..........................जैसे कई नाम है जिन पर हम गर्व करते हैं । लेकिन दूसरी तरफ योगी कि जगह भोगी लोगों कि लिस्ट भी लम्बी होती जा रही है। मुझे महसूस होता है कि हो सकता है धर्म के नाम पर इस तरह का शोषण और पाखंड पहले भी होता रहा होगा ,लोग कह सकते है थाथाकथित धर्म गुरु अनपढ़ और अनजान जनता को गुमराह कर लेते थे। पर इन दिनों जिस तरह के लोग इन मामलो से जुड़े है ,जिन में समाज के एलीट वर्ग के लोग भी भरी संख्या में हैं ,क्या इन्हें भी गुमराह कर लिया गया ?क्या इंतनी बड़ा उद्योग बिना संसंथागत सहयोग के चल सकता है? मेरा यह मानना है( जिससे आप इतफाक नहीं रख सकतें है ) कि इस समाज में इस तरह के बाबाओं का उद्भव और इनके शरण में जाने का चलन पिछले २० - २५ सालों काफी तेजी से बढ़ा है। महत्वाकांक्षी लोग इसको सबकुछ जल्दी पाने का एक सफल(?) रास्ता मानने लगे हैं। क्या हमरे आर्थिक विकास का यह भी एक साइड एफ्फेक्ट है? क्या इकोनोमिक रेफोर्म और समाज में हो रहे इस तरह के दुराचरण के बीच कोई सम्बन्ध है जहाँ सब कुछ जल्दी और जैसे भी पा लेने कि होड़ है ?

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